छत्तीसगढ़ के लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से जारी एक ताज़ा आदेश ने प्रदेश के हजारों शिक्षकों को हैरान-परेशान कर दिया है। आदेश में शिक्षकों को स्कूलों के आसपास घूम रहे आवारा कुत्तों की जानकारी पंचायतों तक पहुंचाने और कुत्तों को पकड़वाने में सहयोग करने को कहा गया है।
शिक्षण कार्य से जूझ रहे गुरुजन अब कुत्तों की गिनती और लोकेशन बताने के नए "अतिरिक्त दायित्व" से स्तब्ध हैं।
क्या अब शिक्षा विभाग, शिक्षकों को ‘डॉग मॉनिटरिंग स्टाफ’ भी मानने लगा है?**
जब स्कूलों में शिक्षक पहले से ही दर्जनों गैर-शैक्षणिक कामों के बोझ से दबे हुए हैं— सर्वे, फॉर्म, पोर्टल अपलोडिंग, जनगणना, पोलिंग ड्यूटी— अब उसमें एक नया अध्याय “आवारा कुत्ता प्रबंधन” जोड़ दिया गया है।
सोशल मीडिया पर भी शासन के इस आदेश का जमकर मज़ाक बन रहा।
लोक शिक्षण संचालनालय का यह आदेश न सिर्फ सवालों के घेरे में है, बल्कि उस व्यवस्था पर दर्दनाक कटाक्ष भी करता है, जहां शिक्षक— जो भविष्य निर्माण का स्तंभ हैं— उन्हें कुत्तों की गिनती और रिपोर्टिंग जैसे कार्य सौंपा जा रहा है। आम जन का कहना है कि यह आदेश शिक्षक जैसे पद की गरिमा को तार-तार करने वाला है। जो बेहद निंदनीय और शर्मनाक है।
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